हम छोटे शहरों के लोग

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रूकते कहाँ है हमेशा के लियें,
कभी लोगों के कटाक्ष से आहत,
कभी अपना अस्तित्व बचानें
थकती हिम्मत के बाद भी ,
दौड़ जाते है एक और बार ।

हम छोटे शहरों के लोग,
छोड़ आये है बहुत पहले ,
आराम घर का और घर का खाना,
न एक है बोली ,ना एक ही ठिकाना,
झुंड में चाहकर भी नही चल पाते ,
चाल अलग औरों से , उनसे चाल मिला नही पाते।

हम छोटे शहरों के लोग
सलीके बडे शहरों के नही आते ,
मिलती है रोज़ अकेलेपन की मायूसी,
मुस्कान का आटा उसी से है गुंथ लेते ,
झुंड मे नहीं नजर आते,
इसीलियें हम एकाकी भी खो नही पाते।

हम छोटे शहरों के लोग ।
~ शिखा झा ठाकुर { अंशु , अभिलाषा} – ३०.१२.२०१६

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